अंजू शर्मा की कहानी ‘गली नंबर 2’

अंजू शर्मा
अंजू शर्मा ने इधर कविता के साथ-साथ कहानियाँ लिखने में भी अपने हाथ आजमाएँ हैं और कुछ बढियाँ कहानियाँ लिखी हैं। इनकी हालिया लिखी कहानी है ‘गली नम्बर दो’ जिसमें जिंदगी के एकान्त से जूझते हुए आखिर एक दिन भूपी की जिंदगी प्यार के रंग में इस कदर रंग जाती है कि उसे सब बदला-बदला नजर आता है यह दुनिया और इसका कतरा-कतरा उसे नया और सुन्दर महसूस होने लगता है। तो आइए पढ़ते हैं अंजू शर्मा की यह कहानी    
 
गली नंबर  
अंजू शर्मा
पुत्तर छेत्ती कर, वेख, चा ठंडी होंदी पई ए।” 
बीजी की तेज़ आवाज़ से उसकी तन्द्रा भंग हुई। रंग में ब्रश डुबोते हाथ थम गए। पिछले एक घंटे में यह पहला मौका था, जब भूपी ने मूर्ति, रंग और ब्रश के अलावा कहीं नज़र डाली थी। चाय सचमुच ठंडी हो चली थी। उसने एक सांस में चाय गले से नीचे उतारते हुए मूर्तियों पर एक भरपूर नज़र डाली। दीवाली से पहले उसे तीन आर्डर पूरे करने थे। लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों से घिरा भूपी दूर बिजली के तार पर अठखेलियाँ करते पक्षियों को देखने लगा।  हमेशा की तरह आज भी एक आवारा-सा ख्याल सोच के वृक्ष की फुनगी पर पैर जमाने लगाआखिरकार ये पक्षी इतनी ऊँचाई पर क्यों बैठे रहते हैं?  ‘ऊंचाई‘, दुनिया का सबसे मनहूस शब्द था और ऊँचाइयाँ उसे हमेशा डर की एक ऐसी परछाई में ला खड़ा करती थीं कि जिसके आगे उसका व्यक्तित्व छोटा, बहुत छोटा हो जाता था!  दूर आसमान में सिंदूरी रंग फैलने लगा था जिसकी रंगत धीरे-धीरे भूपी के रंगीन हाथों सी होती चली गई।
रंगों का चितेरा भूपी उर्फ भूपिंदर, जस्सो मासी का छोटा बेटा है और हमारी इस कहानी का नायक भी है!  यूं कहने के लिए उसमें नायक जैसे कोई विशेषता नहीं थी जिसे रेखांकित किया जाए!  अगर सिर्फ उसकी दुनिया ही हमारी कहानी का दायरा हो तो इस खामोश कहानी में न कोई आवाज़ होगी और न ही संवादों के लिए कोई गुंजाइश रहेगी!  यहाँ भूपी की इस रंगीन कायनात में इधर-उधर, तमाम रंग जरूर बिखरे हैं पर इंद्रधनुषी रंगों से सजी  ये कहानी इन सब रंगों के सम्मिश्रण से मिलकर बनी है यानि वह रंग जो बेरंग है! तो कहानी भूपी से शुरू होती है, भूपी की उम्र रही होगी लगभग उनतीस साल, साफ रंगत जो हमेशा बेतरतीब दाढ़ी के पीछे छिपी रहती थीऔसत से कुछ कम, नहीं कुछ और कम लंबाई, इतनी कम कि देखते ही लोगों के चेहरों पर मुस्कान दौड़ जाती थी!  पढ़ने लिखने में न तो मन ही लगा और न ही घर के हालात ऐसे थे कि वह ज्यादा पढ़ पाता!  कुल जमा पाँच जमात की पढ़ाई की थी पर मन तो सदा रंगों में रमता था उसका!  पान, बीड़ी, सिगरेट, तंबाखू, शराब जैसा कोई ऐब उसे छू भी नहीं गया था!  हाँ, अगर कोई व्यसन था तो बस आड़ी-तिरछी लकीरों का साथ और रंगों से बेहिसाब मोहब्बत  जो शायद उसके साथ ही जन्मी थी और साथ ही जन्मी थी एक लंबी खामोशी जो हर सूं उसे घेरे रहती थी!  उसका कोई साथ या मीत था तो उसके सपने, जो दुर्भाग्य से सपने कम दुस्वप्न ज्यादा थे!  भूपी की खामोश दुनिया अक्सर उन दुस्वप्नों की काली, सर्द, अकेली  और भयावह गोद में जीवंत हो जाती!  ये सपने अब उसकी आदत में शुमार हो गए थे और इनका साथ उसे भाने लगा था!  
कम ही मौके आए होंगे जब उसे किसी ने बोलते सुना था!  यकीनन मुहल्ले से गाहे-बगाहे गुजरने वालों को यह मुगालता रहता होगा कि वह बोल-सुन नहीं सकता!  कहते हैं जब होंठ चुप रहते हैं तो आँखें जबान के सारे फर्ज़ अदा करने लगती हैं पर भूपी की तो जैसे आँखें बस वही देखना चाहती थीं जिसका संबंध उसके काम से हो और आँखों के बोलने जैसी सारी कहावतें बस कहावतें ही तो रह गयी थीं!  पता नहीं ये दुस्वप्नों के नींद पर अतिक्रमण का असर था या कुछ और कि ये आँखें अक्सर बेजान, शुष्क और थकी हुई रहा करती थीं! यह सहज ही देखा जा सकता था कि  उन तमाम काली रातों की सारी कालिमा, सारा अंधेरा, सारा डर और सारा अकेलापन इन भावहीन आँखों के नीचे अपने गहरे निशान छोड़ गया था, हालांकि इनकी इबारत पढ़ पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था, फैक्टरी में दिन भर मेहनत कर रात में गहरी नींद लेने वाली बीजी भी इन निशानों की थाह कब ले पायी थी!
जस्सो मासी उर्फ़ बीजी उर्फ़  जसवंत कौर एक नेक, मिलनसार और खुशमिजाज़ औरत थी जो ज्यादा सोचने में यकीन नहीं रखती थी या उन्ही के शब्दों में कह लीजिये जिंदड़ी ने मौका ही कदो दित्ता”  (जिंदगी ने मौका ही कब दिया) !  गेंहुआ रंग, छोटा कद, स्थूल शरीर, खिचड़ी बाल और कनपटी पर किसी हल्के से रंग की चुन्नी के बाहर, ‘मैं भी हूँअंदाज़ में झूलती एक सफ़ेद लटचौड़े पायंचे वाली सलवार-कमीज़ और चेहरे पर मुस्कान!  मुल्क के बँटवारे ने सब लील लिया थाबँटवारे के दंश को सीने में छुपाएकाफी अरसा हुआ तरुणाई की उम्र में पति के साथ पंजाब से यहाँ आकर बसी थी!  जाने वो दिल था, जिगर था या जान थी जो वहाँ छूट गया था, लोग कहते हैं वो अब पाकिस्तान था!  बहुत समय लगा ये मानने में कि वो मुल्क अब गैर है, कि अब वो हमारा नहीं रहा, कि उसे अब अपना कहना खामखयाली है!  और देखिये न उनकी उजड़ी गृहस्थी और टूटे दिल को उस दिल्ली में ठिकाना मिला जो खुद भी न जाने कितनी बार उजड़ी और बसी थी!  पर दिल्ली जब हर बार उजड़ कर बस गयी तो जस्सो मासी की नयी-नयी गृहस्थी भला कब तक उजड़ने का दर्द सँजोती रहती!  दिल्ली ने ही उनकी तरुणाई की वे जाग-जाग कर काटी रातें देखीं, तिनके-तिनके जोड़ कर जमाया घौंसला देखा और दिल्ली ही असमय पति के बीमार हो जाने पर 2 बच्चों के साथ हालात की चक्की में पिसती, उस जूझती फिर भी सदा मुस्कुराती माँ के संघर्षों की मौन साक्षी बनी!  इन मुश्किलों ने उन्हे जुझारू तो बना ही दिया था, साथ ही वे छोटी-छोटी बातों को दिल से लगाने को फिज़ूल मानने लगी थी!  यूं भी जिंदगी ने उन्हे सिखाया था जब मुश्किलें कम न हो तो उनसे दोस्ती कर ली जाए, उन्हे गले लगा लिया जाए!
यह एक निम्न-मध्यमवर्गीय लोगों का मोहल्ला था, जहां रहते हुये लोगों को न तो बीत गए सालों की संख्या याद थी और न ही एक दूसरे से कब रिश्ता बना यह भी याद रहता था!  अपने छोटे-छोटे सुखों को महसूसते और पहाड़ जैसे दुखों से लड़ने को अपनी आदत में शुमार किए उन लोगों का बड़ा-सा परिवार थी यह गली, जिसे गली नंबर 2 कहा जाता था!  इन लोगों ने धर्म, जाति और क्षेत्रीयता जैसे तमाम आग्रहों से ऊपर उठकर एक नए पंथ की अघोषित, मौन स्थापना कर दी थी जिसे भाईचारा कहा जाता था, जो खून के रिश्तों से कहीं ऊपर था!  कोई हालांकि कई बार छोटी-छोटी बातों पर झगड़ते ये लोग शाम को साथ मिलकर मन-मुटाव को साथ साथ विदा कर देते थे!  तो जस्सो मासी, जी हाँ लोग उन्हे इसी नाम से पुकारा करते थे, यूं तो कहने को दो बेटो वाली थी पर बड़ा बेटा करमजीत उर्फ काके, बेटा कम अपने पूर्वजन्म के कुकर्मों का फल ज्यादा लगता था उन्हे!  पिता की बीमारी और घर में कामकाजी माँ की गैर-मौजूदगी ने जहां छोटे को चुप्पा बना दिया था, वहीं बड़ा निकम्मा, और नाकारा निकला हालांकि कहने के लिए किराए का ऑटो चलाया करता था, शराबी-कबाबी ऊपर से एक दिन एक एंग्लो-इंडियन लड़की को घर ले आया!
कहने लगा बीजी, बहू है तुम्हारी, इसके साथ कोर्ट मैरेज की है!”
  
अब आप जानो जस्सो मासी तो जस्सो मासी ठहरी!  फौरन उसे दरवाज़ा दिखा कर कहा-
फिटे मुंह तेराजित्थों लाया है, ओत्थे ही छडके आ मोए!”
तीन दिन के भीतर मुहल्ले वालों और इक्का-दुक्का नातेदारों को इकट्ठा किया और फेरे डालकर बहू को घर ले आई!  ढोल बजा तो पूरे मोहल्ले से ज्यादा जस्सो मासी नाची थी!  दबी ज़बान से बहू के धर्म पर छींटाकशी करने वालों की कमी नहीं थी पर जस्सो मासी ने यह कहकर सबका मुंह बंद कर दिया कि  “औरत की भला क्या जात और क्या धरम, पानी जिस भांडे में गया वैसा ही हो गया!  लौटे विच पाओ तो लौटे वरगा, होर थाली विच पाओ ते थाली वरगा!”   तो ग्लेडिसअब लक्ष्मीहो गयी थी!  और गली नंबर 2 का क्या कहना, कुछ दिनों की कानाफूसी के बाद वही लक्ष्मीसबकी लाड़ली बहू थी और सुबह दिन निकलते ही पैरी-पैना चाचीजी‘ ‘पैरी-पैना मासीजी” करते हुये उसकी कमर दोहरी हो जाती थी!  यूं चार दिन तो मज़े में कटे फिर चंद दिनों में ही शाम को डगमगाते कदमों से लौटते पति की खस्ता हालत, कपड़ों से आती असहनीय दुर्गंध और खाली जेब ने कुल मिलाकर जो तस्वीर खींची थी उसमें लक्ष्मी को भविष्य पर छाई अंधकार की छाया  साफ दिखाई पड़ती थी और ये भी कि अब तो बस सास के सहारे दिन कटेंगे या खुद ही कमा-खाकर गुज़र होगी!  मायके में चर्च में जाकर जीभर रोयी पर कहीं कोई रास्ता नहीं था!  खुदा उसका नसीब लिखते हुये सारी स्याही खो बैठा था बस दूर तक काला रंग बिखरा नज़र आता था!

 
हरे-पीले-लाल-नीले-बैंगनी-नारंगी–दुनिया की भागदौड़ और चकाचौंध से दूर भागते भूपी को रंगों में निजात मिलती थी!  ये और बात है कि उसके मन में दुनिया को लेकर जो भी तस्वीर बनती थी वो बहुत बेरंग थी!  अपने कद को लेकर कोई ग्रंथि पाली हुई थी उसने या फिर ऊंचाई से उसका डर इसका कारण था, भूपी अक्सर ऊंची-लंबी आकृतियों से मुंह फेर लिया करता था!  उसके अवचेतन में सदा एक लंबा ऊंचा ठूंठ सा वृक्ष विद्यमान रहता था जो मन को कभी हरा-भरा होने ही नहीं देता था!  ऐसा नहीं था उसने कोशिश नहीं की, पर उसकी तमाम कमजोर कोशिशें उस ठूंठ की ऊंचाई के सामने हार मानकर दम तोड़ गईं!  कभी कभी भूपी को लगता था उसकी ऊँचाई हर रोज़ थोड़ा कम हो जाती है और ठूंठ हर रोज़ उतना ही बढ़ जाता है!  उसे लगता था किसी दिन यह ठूंठ उसकी पूरी लंबाई को लील लेगा और वह पूरा का पूरा इसी ठूंठ में समा जाएगा!  उसका यह डर अमूमन दिन में जाने कहाँ सोया रहता और रात में धीरे धीरे उसकी नींद पर काबिज हो जाता!  वह पसीने-पसीने हो जाता और अपने घुटनों को पेट में घुसाए, खिड़की से बाहर स्ट्रीट-लाइट को देखते-देखते सुबह का इंतज़ार करता!   उसकी बेचैनी  बढ़ जाती और रगों में दौड़ता लहू, मानो लहू नहीं किसी ज्वालामुखी से निकलता गरम लावा हो जाता जिसका बहाव उसे दुनियावी चहल-पहल से कहीं दूर ले जा पटकता!   हैरत की बात यह थी कि जो  भूपी पहले घंटों अपनी दुनिया में लौटने की कोशिश करता रहता था उसे अब ये  दूसरी अंधेरी, भयावह दुनिया रास आने लगी थी!  ये दर्द, ये तकलीफ, ये बेचैनी और ये डर उसकी आदत जो बन गए थे! 
 
इधर ग्लेडिस उर्फ लक्ष्मी ने देखा उसके अलावा ससुराल में कुल जमा चार प्राणी हैं!  पति आधे दिन बोतल भर के लायक कमाता है और सब कमाई दारू में उड़ा देता है! ससुर बीमार और लकवे से लाचार है!  सास किसी फ़ैक्टरी में काम करती है और देवर यानि भूपी मूर्तियाँ बनाता है!  लोगों को लगा था बहू ईसाई है चार दिन में सब छोड़छाड़ कर अपने घर लौट जाएगी!  उसके घरवालों ने भी कुछ इसी तरह की सलाहें उसकी झोली में डाल दी पर लक्ष्मी, जो अपने परिवार की सारी हिदायतों, आशंकाओं और भविष्यवाणियों को नज़रअंदाज़ कर इस घर में आई थी, उसने इस रिश्ते को एक मौका देने का फैसला किया!  दिन बीतते गएपता नहीं ये फेरों पर खाई कसमों का असर था या सास का स्नेह, गरीब माँ-पिता की लाचारी की चिंता थी या घुटने टेकने से इंकार करती, गर्भ में आ गए एक अजन्मे शिशु की माँ की जिजीविषा थी कि लक्ष्मी, लक्ष्मी ही रही, फिर कभी ग्लेडिसनहीं बनी तो नहीं बनी!  गले में डला क्रॉस‘ ‘में बदल गया और  उसने एक टिपिकल संस्कारी बहू की तरह सास की गृहस्थी संभाल ली, वहीं रोजी रोटी के लिए देवर की मदद करने लगी!  सास को चूल्हे चौके से छुट्टी मिली, ससुर को दवाई समय पर मिलने लगी वहीं भूपी के अकेलेपन के दायरे में लगी सेंध ने कुछ दिनों के लिए उसे परेशान तो जरूर कर दिया था पर वक़्त का पहिया जब मंथर गति से आगे सरकता गया तो धीरे-धीरे यह  अतिक्रमण उसे भी रास  आने लगा!  और हुआ यूं मूर्तियाँ अब गली नंबर 2 की आवाजाही, एक-दूसरे की चुगलियाँ करती औरतें और भूपी की खामोशियों से इतर भी कुछ आवाज़ें सुनने लगीं थी!   
भाभी, पीला रंग कब खत्म हुआ होर हरा रंग किन्ना  लाणा है ……”

भाभी, एक कप चा पीणी है…..”

भाभी, सिंह साहब का आदमी क्या बोल रहा था….” वगैरह वगैरह……..
भूपी ने मूर्तियाँ बनाने का काम छुटपन में ही सीख लिया था, कुछ अरसा काम एक दोस्त के घर काम किया और फिर जल्दी ही अपना काम शुरू कर दिया!  रबर की डाई उर्फ साँचे में प्लास्टर ऑफ पेरिस का घोल डाल कर उसे छत पर सुखाया जाता था!  एक लाइन से बने 10 x 10 के चार कमरों को जोड़ कर बनी लंबी छत पर लाइन से मूर्तियाँ रखी रहती थीं!  एक कोने में एक छप्पर डला था जो अक्सर स्टोर रूम का काम करता था! मूर्तियाँ पूरी तरह से सूखने के बाद उन्हे रंगा जाता था!  ये दिवाली से ठीक पहले का समय था!  तो बस चारों और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ ही नज़र आती थीं!  ऑर्डर के मुताबिक लक्ष्मी गणेश की कुछ मूर्तियों को सुनहरा रंगा जाता था, कुछ को पूरा सिल्वर कलर किया जाता था और बाकी को विभिन्न रंगों में रंगा जाता था!  थोड़े ही दिनों में लक्ष्मी ने सब सीख लिया था, कैसे सबसे पहले सिंहासन पर फिरोजी रंग, लक्ष्मी जी की साड़ी में लाल रंग, उनकी चोली में हरा रंग, गणेश जी के वस्त्रों में पीला रंग, हाथ पाँव में पीच रंग और गहनों को सुनहरा रंगा जाता था!  यहाँ तक तो सारा काम दोनों मिलकर करते थे, बस इसके बाद का काम केवल भूपी ही करता था और यह था उनकी आँखों का चित्रण!  मूर्तियों में प्राण फूंकने वाला मुहावरा यहाँ साकार हो जाता जब भूपी बड़े मनोयोग से, अपने सधे हाथों से उनकी आँखें  चित्रित किया करता था!  एक-एक कर मूर्तियाँ साकार हो उठती थी और लक्ष्मी उन्हे गिनते हुये ऑर्डर पूरा होने की खुशी में झूम उठती थी!  इसके बाद ईंटों के एक छोटे से चबूतरे पर रखकर उन पर वार्निश का स्प्रे किया जाता! जहां एक ओर  मूर्तियाँ जीवंत हो चमक उठती वहीं उनके रंग भी पक्के हो जाया करते! लक्ष्मी के लिए ये मूर्तियाँ केवल मूर्तियाँ नहीं थी, घर का राशन थी, बच्चों की स्कूल की फीस थी, बिजली का बिल थी और मकान-मालिक का चाहे मामूली-सा ही सही, पर समय पर दिया जाने वाला किराया भी थी!
ओए होये, अबे तू जमीन से बाहर आएगा या नहीं?”

भूपी, तू तो बौना लगता है यार!!! ही ही ही !!”

अबे तू सर्कस में भर्ती क्यों नहीं हो जाता, चार पैसे भी कमा लेगा”

साले, तेरी कमीज़ में तो अद्धा  कपड़ा लगता होएगा और देख तेरी पैंट तो चार बिलाँद की भी नहीं होगी!”
ओए तुझे कौन अपनी लड़की देगा, बड़े होकर काके के न्याणे (बच्चे) खिलाने हैं तेनु ….”
…………
भूपी, वर्माजी के ऑर्डर का कितना काम अभी बाकी है?” 
लक्ष्मी ने  गीले कपड़े से हाथ पौंछते हुये पूछा और भूपी फ़्लैशबैक से बाहर आ गया!  लगा जैसे किसी ने जंजीरों में जकड़ दिया था और वह दूर भाग जाना चाहता है!  बदन पसीने पसीने हो रहा था!  सांस धौंकनी की तरह चल रही थी और कनपटियाँ जैसे शरीर के सारे लहू को अपने में समाये सुर्ख हो गईं थीं!  लग रहा था  जैसे वह मीलों लंबी दौड़ दौड़ कर लौटा है! 
दो दिन होर लगने हैं!”

दोबारा पूछने पर भूपी के भावहीन चेहरे ने बिना नज़र उठाए ही बुदबुदाया!  लगा आवाज़ कहीं दूर किसी गहरी खाई से आ रही है!  उत्तर रस्म अदायगी भर था और इन शब्दों से उसे कोई लेना-देना नहीं है!  इतना तय था कि उस हाँफते जिस्म और लड़खड़ाती ज़बान के लिए इससे कम शब्दों अपनी बात कहना शायद संभव न रहा होगा!
लक्ष्मी बच्चों को स्कूल भेज चुकी थी!  ससुर नाश्ता करने के बाद आराम से सो रहे थे!  उसका पति काके काम‘  पर जा चुका था और सास आज जमनापार एक जानकार के यहाँ गयी थी!  भूपी का काम अब अच्छा चल निकला था, लक्ष्मी का साथ मिलने से अब वह ज्यादा ऑर्डर ले सकता था!  मूर्तियाँ तो पहले ही उसकी अभी मुंह से बोल उठने वाली लगती थीं!  किराए के उस छोटे से एक कमरे-रसोई वाले घर को माँ ने खरीद कर ऊपर भी एक बड़ा कमरा बना लिया था, जहां बहू लाने के वह सपने देखने लगी थी!  लौटी तो चेहरे पर चिरपरिचित मुस्कान कुछ और गहरी हो गयी थी और हाथ में बर्फी का डिब्बा था जिसे उसने पूरे मुहल्ले में बांटा था!  भूपी ने दूर खड़े बिजली के खंबे को देखा तो उसके मुंह का स्वाद कसैला होता गया!  पता नहीं क्यों वो आज कुछ ज्यादा ही लंबा लग रहा था!  आँखें बंद होते ही ठूंठ एकाएक आसमान को छूता नज़र आया!  उसने घबराकर आँखें खोल दी!  आक थू sssss”   उसने बर्फी थूक दी और निर्विकार शून्य में ताकने लगा!

जब ठोकरें नसीब में हो तो भरे-पूरे संसार को भी एक छोटी सी चिंगारी लील लेती है!  कुछ ऐसा ही सन 84 में सिखों के साथ हुआ था!  84 के प्रेत ने मुंह खोला और पंजाब के एक गाँव में रहने वाले सरदार दलजीत सिंह दो-दो गबरू जवान बेटों के साथ रोती-बिलखती पत्नी और 16 साल की जवान बेटी को छोड़ कर उसके मुंह में समा गए!  सदमे ने उनकी पत्नी कुलवंत के होश छीन लिए और जब होश आया तो पाया दुनिया उजड़ चुकी थीलालची रिश्तेदारों की मेहरबानी से अब न पास में जमीन थी और न सर पर छत!  अपनी बच्ची को सीने से लगाकर दूर के रिश्ते के एक भाई के पास दिल्ली चली आई!  अजीब आलम था, न गले से निवाला उतरता था और न ही रातें दिल में भरी बेचैनी को कुछ आराम दे पाती थीं!  उनकी रातें जैसे किसी अज़ाब की गिरफ्त में थीं और उनके दिन इसे पहेली से सुलझाते हुए शाम के कदमों में दम तोड़ दिया करते थे, क्योंकि शरीर को न भूख सताती थी और न ही नींद बस अगर कुछ दिखाई देता था तो सोहणी की चढ़ती जवानी और अल्हड़ अटखेलियां!
ये बीसवाँ साल किसी भी लड़की के जीवन पर एक बसंती चादर की तरह छा जाता है जिसकी छांव में हर लम्हा वसंती लगने लगता है!  पिता अपनी सूरत और सीरत के साथ अपना डील-डौल भी सोहणी को सौंप गए थे!  खासा लंबा क़द, चौड़ा हाड़, दबा हुआ रंग और गदराया हुआ भरा जिस्म, साधारण शक्लों-सूरत के बावजूद सोहणी भीड़ में भी अलग नज़र आती थी!   कुछ साल  बीत चुके थे, कुछ अरसा तो बाप-भाइयों की मौत का शोक उस पर हावी रहा, फिर दिल्ली की आबोहवा और नयी बनी सहेलियों का साथ, मन आवारा परिंदे से उड़ने लगा और जवानी एक साथी मांगने लगी थी, जोबन का असर अपने शबाब पर थाऔर मन सपनों की गलियों में रोज़ सैर पर जाने लगा!  उसका बेपरवाह अंदाज़, ज़ोर से खिलखिलाना और मस्तानी चाल, माँ के कलेजे में बरछी की तरह गड़ते थे!   हायो-रब्बा, मरजानी कितनी जल्दी बड़ी हो गयी”  अक्सर वे सोचा करतीं!  उनका बस चलता तो उसकी उम्र का पहिया कब का थाम चुकी होती!
खैर, कुलवंत कौर ने कई जगह बात चलाई पर किसी को पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए थी, किसी को ऊँचा घर-बार, कोई दाज में 10 तोले सोना चाहता था तो कोई बजाज का स्कूटर!   बिन बाप-भाई की लड़की का ब्याह वो भी बिना दहेज इतना आसान भी नहीं था! इससे पहले कि ऊँचनीचकी आशंका से परेशान कुलवंत कौर और हलकान होतीं पड़ोस की एक पंजाबी महिला ने उन्हे जस्सो मासी के बेटे भूपी के बारे में बताया!  ये महिला भी जस्सो मासी के साथ ही फ़ैक्टरी में काम करती थी!  जमना-पार के उस मोहल्ले में आज भी इतनी सदाशयता बाकी थी कि जवान लड़की माँ-बाप के साथ-साथ पड़ोसियों की भी साझी चिंता का कारण बना करती थी!  लड़के का कमाऊ और शरीफ होना ही सबसे अधिक सुकूनदायक बात थी, उम्र में दस साल का फर्क तो बातचीत का विषय बनने लायक समझा ही नहीं गया!   
आहो जी, की फरक पैन्दा ए?”  फिर  भाभी का ईसाई होना भी भला कोई बात हैये क्या कम है कि कोई डिमांड-शिमांडनहीं है !  बस दो जोड़ी कपड़ों में लड़की भेजने की बात है! अगले व्याह दा ख़रच उठान लई भी तैयार हैं!”  डूबते को तिनके का सहारा काफी होता यहाँ तो साहिल खुद सामने आकर बाज़ू दे रहा था!  कुलवंत कौर ने हाथ जोड़कर बात चलाने के  लिए कहा, हालांकि उनकी जागती रातों को अब एक नया काम मिल गया था!  अब तो दिन-रात वाहेगुरुसे  इस रिश्ते के सिरे चढ़ने की अरदास करते बीतता था!  ऐसा नहीं था कि सोहणी को  माँ की इस हालत का अंदाज़ा नहीं था, वो खुद दुआ करने लगी थी कि माँ की खोयी नींदें उसे वापिस मिल जाएँ!
अमावस की रात अधिक काली हो जाती है अगर मन का अंधेरा बढ़ जाए!  लगातार चौदह दिन ड्यूटी देने से थके, उकताए चाँद ने उस रात विश्राम के लिए बादलों की चादर ओढ़ ली और सोने चला ये सोचकर कि कल फिर से उगेगा नयी उम्मीद और नए रूप के साथ!  अंधेरे के लबादे ने आहिस्ता-आहिस्ता गली नंबर 2 को भी अपने साये में ले लेने के लिए कदम बढ़ाया था पर स्ट्रीट लाइट ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया!  उस रात जस्सो मासी  अपने कुछ परिचितों के घर कार्ड बांटने गई हुई थी!  लौटने में देर होने पर शायद वही रुक गयी होगी!  बड़े की शादी इतनी जल्दबाज़ी में हुई थी कि इस बार मासी कोई कोर-कसर नहीं छोडना चाहती थी!  भूपी ने कुछ साल पहले मनोयोग से एक मूर्ति बनाई थी!  एक लड़की की वह सुंदर मूर्ति इतनी दिलकश लगती थी कि मासी ने उसे कमरे के कोने में रख छोड़ा था!  भूपी ने उसे मनचाहे रंगों से सुंदर कपड़े और गहनों से सजाया था, उसकी देहयष्टि इतनी चित्ताकर्षक थी कि अक्सर देखने वालों का ध्यान खींच लेती थी!  भूपी ने एकटक उस मूर्ति को निहारते हुये अपनी आँखें बंद की और बिस्तर पर लेट गया!  रात के गहराने के साथ नींद भी गहराने लगी थी!  
देर रात अचानक भूपी को लगा मूर्ति, मूर्ति नहीं जीती-जागती एक लड़की  है जो धीमे-धीमे मुस्कुरा रही है!  उसकी आँखें इतनी सम्मोहक है कि उसके आकर्षण से बचने के किसी प्रयास के करीब आ पाने का कोई चांस नहीं है!  अमावस की उस काली रात में भी पूरा कमरा एक अनोखी रोशनी और खूशबू से सराबोर है!  भूपी उठा और उसकी और बढ्ने लगा, मात्र तीन कदम के बाद वह उसके सामने था!  करीब, बेहद करीब, उसके होंठों पर गहरी मुस्कान थी और उसकी साँसे अब भूपी के साँसों में एकाकार हो रही थी!  भूपी ने महसूस किया, खून की गर्मी उसके पूरे जिस्म  को गरमा रही थी!  जिस्म जैसे आग की भट्टी की तरह तप रहा था!  सम्मोहन से खिंचे आए भूपी ने उसे अपनी बाहों में भरना चाहा!  उसके तपते होंठ अभी उन सुर्ख मदमाते होठों की ओर बढ़े ही थे पर ये क्या एकाएक मूर्ति का  क़द बढ़ने लगाऊंचा, ऊंचा  और ऊंचाइतना ऊंचा कि काफी ऊंची बनी उस कमरे की छत को छूने लगा!  फिर जाने छत कहाँ गायब हो गयी और औरत की लंबाई बढ़ती रही, उसकी मुस्कान अब विद्रूप हो गई, मानो बाहें फैलाये खड़े भूपी का मज़ाक उड़ा रही हो!  मुस्कान अब ठहाकों में बदल गयी और भूपी जैसे जड़ हो गया, वह न तो हिल पा रहा था और न ही बोल पा रहा था!  उसे लग रहा था वह बौना और ज्यादा बौना होता जा रहा है!  फिर अचानक अट्टहास करती वह मूर्ति ठूंठ में बदलने लगी, वही लंबा, निर्जीव, अकेला और डरावना ठूंठ!  तभी मुर्गे की बांग ने स्याहीचूस की तरह उसकी नींद का सारा कालापन सौख लिया और भूपी इस दुनिया में वापस लौट आया था!  बाहर अब भी स्ट्रीट लाइट की रोशनी थी, भूपी बिस्तर पर सिमटा हुआ था, उसका वजूद एक सूखे पत्ते की मानिंद काँप रहा था, साँसे फिर धौकनी की तरह चल रही थी!  कोई देखता तो हल्के सर्द मौसम के बावजूद उसके चेहरे पर पसीने का असर साफ नज़र आता!  बमुश्किल भूपी देख पाया कि मूर्ति अब भी पहले की तरह वहीं कोने में चुपचाप खड़ी थी!  शांत और बेजान!
साली, ज़बान चलाती है, एक शबद होर निकाला तो ज़बान खींच लूँगा!  तेरे बाप की नहीं पीता हूँ, अपनी कमाई से पीता हूँ!”
लक्ष्मी दरवाज़े पर बुत बनी खड़ी थी!  घर की इज्ज़त सरेआम रुसवा हो रही थी और थर-थर दोनों बच्चे उसकी ओट में खड़े गली में हो रहा तमाशा देख रहे थे!  शराब इंसान को कितना गिरा देती है, यह वह अग्नि है जिसमें प्यार-मोहब्बत, रिश्ते-नाते क्या घर के घर होम हो जाते हैं!  काके शराब पीता था और शराब बदले में उस घर का चैन, सुकून, इज्ज़त और नेकनामी जाने क्या-क्या पी रही थी!  काके रात भर हवालात की हवा खाकर आया है!  एक दिन बीजी घर से बाहर रही और उसे चिलत्तर करने का मौका मिल गया!  जस्सो मासी ने उसका गरेबान पकड़ा और घसीटती हुई कमरे में ले गयी!  हवालात से आने के बाद भी उसने चढ़ाली थी और अब न उसे बीजी का परेशान चेहरा नज़र आता था, न लक्ष्मी की लाल-सूजी आँखें नज़र आती थी!  जिसे अरमानों से ब्याह कर लाया था उसके चेहरे पर पुती श्मशान सी कालिख धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी में उतर आई थी, और वो था कि शराब के कतरों में अपनी बिखरी जिंदगी की किरचें चुन रहा था!  दिन भर बेहोश पड़ा रहा, शाम होने पर बीजी के पैर पकड़कर माफी मांगने वाला काके क्या वही था!!!!   यकीन के चिथड़े बटोरने का आदी जितना यह परिवार था उतनी ही अब तक गली नंबर 2 भी हो चली थी!  दूधवाला दूध ला रहा था, बच्चे गली में स्टापू खेल रहे थे और औरतें धूप जाने के बाद मँजी (खाट) खड़ी कर शाम के खाने का मेन्यू बतिया रही थी! 
गल सुन, यहाँ आ!”
क्या बात हैक्या चाहिए, खाना बना रही हूँ!”
तू मुझसे नाराज़  है  ना?”
कोई उत्तर नहीं!
अच्छा माफ कर दे यार, भोत शर्मिंदा हूँ, आगे से नइ पीऊँगा!”
कोई उत्तर नहीं!
देख, तेरी सौं….पक्का!!!!”
लक्ष्मी ने एक नज़र पति पर डाली पर कोई उत्तर नहीं दिया!  मन ही मन बुदबुदाई “सब नौटंकी” और चुपचाप रोटी सेंकने लगी!  उसकी आँखों में जाने कितने आँसू  थे जिनका पानी मानों सूखता ही नहीं था!  जब-जब उसने सोचा उसके आँसू सूख गए हैं तब-तब कोरों से टपक जाते थे!    जाने इन आँखों ने कितने समंदर जमा किए हुये थे कि खत्म ही नहीं होते थे!  और कमबख्त जाने क्या बदा था उसके नसीब में!  उसने पिछले चार दिन से काके से कोई बात नहीं की!  उसने क्या, बीजी और बच्चों ने भी मौन साधा हुआ था और भूपी तो बात करता ही कब था!  शाम को लक्ष्मी के मॉम-डैड उसे ले जाने आए थे!  उसने सूटकेस निकाला और खामोश अपना सामान पैक करने लगी!  काके माफ़ियाँ मांग रहा था, बीजी चुपचाप आँसू बहा रही थी!  ‘कमबख्त मोए‘ ने किसी लायक ही कहाँ छोड़ा था कि वे प्रतिरोध करतीं!  लक्ष्मी बच्चों को साथ ले निकलने ही वाली थी कि बीमार और बूढ़े ससुर ने हाथ जोड़ लिए!  वे बोले तो कुछ नहीं पर उनकी सूजी आँखें और झुर्रियों से भरे ज़र्द चेहरे आसुओं की आड़ी-तिरछी इबारत ने सब कह दिया!  सूटकेस हाथ से छूट गया और वह अंदर दौड़ गयी!  कोई नहीं जानता था, काके को अपनी हरकतों पर वाकई अफ़सोस था या फिर कोई नौटंकी, पिछले चार दिनों से वह भी पीना छोड़ कर रोज़ चुपचाप खाना खाता और ऑटो लेकर निकल जाता था!  उस दिन शाम को लक्ष्मी के हाथ में हज़ार रुपए रखे और कान पकड़ कर खड़ा हो गयातो उसने अविश्वास से अपनी हथेली पर नज़र डाली, उसे लगा दुनिया के सारे सुख उस हथेली पर सिमट आए हैं उसने मुट्ठी भींच कर कलेजे से लगा ली, और आँखें भींच कर इस सुख को पीने लगी, कहीं इस अमृत का एक कतरा भी चू गया तो अनर्थ हो जाएगा!  और उसका माही जिसके कलेजे से वह लगी थी चुपचाप उसके आँसू पोंछ रहा था!  दो पश्चाताप के आँसू टपक के उन आंसुओं में मिले और लक्ष्मी को लगा जैसे तक़दीर के आईने पर बरसों से जमी बदकिस्मती की मनहूस गर्द हट गयी और नया दिन निकल आया हो! 
काला डोरया कुंडे नाल अड़या ओए, के छोटा देवरा भाभी नाल लड़या ओए”  ढोलक की थाप पर ज़ोर-ज़ोर से व्याह के गाने गाये जा रहे हैं!  आखिरकार वो दिन आ ही गया!  व्याह वाले दिन  बेतरतीब दाढ़ी और ऊबड़-खाबड़ बालों के पीछे से भूपी का गोरा-चिट्टा चेहरा ऐसे दमक कर सामने आया था जैसे कालों बादलों के पीछे से चाँद निकल कर सामने आता है!  और लोग थे कि अपलक निहार रहे थे!  कुछेक को तो भ्रम हो गया था कि ये भूपी नहीं कोई और है!  सुंदर कपड़ों में बैठा हुआ वह किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था, जस्सो मासी जिसकी बलाएँ ले रही थीं!  उसकी बेजान और निर्जीव आँखों का सूनापन, भाभी के लगाए काजल के पीछे कहीं छुप सा गया था!  उन आँखों में कोई सपना नहीं था, शुष्क और खाली-खाली आँखों से इस सारे तमाशे को देखता भूपी भाभी की एक शरारत पर धीमे-से मुस्कुरा दिया!  सोहणी के लिए उसकी लंबाई पता नहीं कोई मायने रखती थी या नहीं पर भूपी….!  भूपी के मन में चल रहे अंधड़ों के आगे गाजे-बाजे की सब आवाजें बस शोर थीं!  और इस शोर के सामने उसके मन की आवाज़ मानो नक्कारखाने में तूती की आवाज़ की तरह विलीन हो गयी!

आज शादी को दो दिन बीत चुके हैं!  सोहणी पैर फेरनेके बाद अभी भूपी के साथ वापस लौटी है!  ससुराल से शादी के बाद पहली बार मैके जाने की इस रस्म में भूपी को सोहणी को साथ लाना था!  वो जो ऑटो में सोहणी के साथ बैठ कर आया है, क्या वह भूपी है?   नहीं, वह तो उसकी परछाई है, भूपी तो सोहणी को देखने के बाद जाने किस बियाबान में खो गया था!  उसका डील-डौल, उसकी लंबाई और उसका खिलंदड़पन, सब भूपी को उसके करीब जाने से रोकने के हथियार साबित हुये!  वो जितना करीब आती थी, भूपी उतना ही दूर होता जाता था! उसे लगता था सोहणी उससे दूर, बहुत दूर इतनी ऊँचाई पर खड़ी है जहां पहुँचने के लिए अगर वह अपने सारे अरमानों, सारी ख़्वाहिशों, सारी तमन्नाओं को सीढ़ी में बदल दे तो भी उसे नहीं छू पाएगा!  पर सौ टके का सवाल यह था क्या भूपी वह सीढ़ी बनाने का ख़्वाहिशमंद था या अपने ही अन्तर्मन के अँधेरों से जूझता भूपी आज किसी की ख़्वाहिश या आरज़ू करने की हिम्मत ही नहीं जुटाना चाहता था!  यूं भी चाहतों को राहों या राहत तक पहुँचने के लिए जिस जज़्बे की, जिस इच्छाशक्ति की दरकार है वह भूपी के जीवन में नदारद हैउसने जीतने से पहले ही अपने हथियार नियति को सौंप दिये थे और चुपचाप नसीब के भंवर में खामोश बहता जा रहा था! 

चारों और गहन अंधेरा है! भूपी एक रेगिस्तान में अकेला खड़ा है!  दूर-दूर जहां तक नज़र जाती है, उसके मन और जीवन में मौजूद जाने-पहचाने अकेलेपन का साम्राज्य है, चुप्पी का शासन है और ख़ामोशी की सल्तनत है!  इस रेगिस्तान की दहक और नीरवता क्या उसके मन की तपन से कहीं ज्यादा थी!  उन कंटीली झाड़ियों में ज्यादा कांटे और चुभन हैं या फिर उसकी अंतरात्मा को छलनी कर देने वाले शूलों के घाव ज्यादा हैं!  एकाएक रेतीली आंधियों ने उसे घेर लिया!  भूपी को दूर-दूर तक कुछ नज़र नहीं आ रहा है!  एक काला साया उसके करीब नमूदार हुआ और उसे जकड़ने लगा!  भूपी घबरा कर उस साये से खुद को छुड़ाना चाहता है!  वह लगभग जाम हो चुके हाथ-पाँवों को  झटकना चाहता है, पर बेबस है, लाचार है!  वह अपनी सारी ताक़त को इकट्ठा कर पूरा ज़ोर लगाता है और साये की गिरफ्त से खुद को छुड़ा लेता है!  “आह!!!!!!!”  ये आवाज़ सोहणी की है जो बिस्तर पर उसके करीब लेटी थी!  उसका एक हाथ भूपी के सीने पर था और भूपी एक झटके में उसकी बाहों से खुद को छुड़ा कर कमरे से बाहर निकल जाता है!  ये उसे क्या हुआउसका माथा जल रहा है और कंपकपाता शरीर बुखार से तप रहा है!  ओह!!!! न जाने क्योंजिंदगी में आज पहली बार उसे शिद्दत से सिगरेट की तलब महसूस हो रही है! 
दिवाली को बीते अब महिना बीत चुका है!  सोहणी 10 दिन बाद माँ के घर से लौटी है!  जब गई थी तो उन दिनों भूपी की तबीयत कुछ ठीक नहींउसे आराम चाहिए था!  इधर माँ के साथ पंजाब भी हो आई थी!  ‘सीज़नके बाद भूपी के पास इन दिनों ज्यादा काम नहीं होता!  पूरा दिन या तो थोड़ी बहुत मूर्तियाँ बनाने में जाता है या फिर छत के कोने में बैठ कर कागज़ पर आड़ी-तिरछी लकीरें निकालने में अपने वक़्त  की रेज़गारी को बेभाव खर्च किया करता है!  सीज़न की थकान और आपाधापी के बाद मिले सुकून के ये लम्हे उसे बेचैन करते हैं!  उसका बस चले तो काम को कभी खत्म ही न होने दे!  तभी एक कंकड़ उसके पैरों पर आ कर लगा और विचारों के झंझावात का  सिलसिला छन्न से टूट गया!  सोहणी छत पर कपड़े सुखा रही है, न चाहते हुये भी भूपी का ध्यान उसकी ओर चला ही गया!  गुलाबी पंजाबी सूट और पटियाला सलवार में कसा उसका गदराया जिस्म, चोटी में बंधे लंबे काले बालों के नीचे झूलता सुनहरी परांदा, हाथों में चमकते चूड़े का लश्कारा (चमक), भूपी का दिल चाहा उसे ताउम्र निहारता रहे पर एकाएक उसकी नज़रें सोहणी से मिली और वह देखते ही फिक्क से हंस पड़ी!  भूपी चुपचाप सिर झुका कर पेंसिल से खेलने लगा, भूपी की चुप्पी और सोहणी की शरारतें, कभी कभी लगता है दो विपरीत प्रकृति वाले लोगों के बीच का धनात्मक और ऋणात्मक का फर्क उन्हे बार बार करीब खींचता है!   दोनों ही अपने अंदर भावनाओं का अथाह समुद्र लिये होते हैं जो ऊपर से तो शांत दिखाई देता है लेकिन हलचल होने पर किसी सूनामी से कमतर नहीं होता है!  सोहणी की पायल की छम-छम, चूड़े की खनखनाहट और उसकी मदहोश हंसी, होना तो यह था कि भूपी इस सूनामी में खामोश बह जातापर सोहणी अक्सर उसे  किनारे पर शांत, उदासीन  खड़े देखती! हालांकि हर रात  इस शांति की आड़ में वह उस सूनामी की लहरों में कितने ही थपेड़े खा कर वापस किनारे की ओर लौट आता था ये कोई नहीं जानता था!
शाम को भूपी वर्मा जी के यहाँ गया था!  मूर्तियों का हिसाब अभी बाकी था, दूसरे व्याह में को खर्चा हुआ, उससे हाथ थोड़ा तंग हो गया था!  वर्मा जी बाहर गए थे पर उन्होने फोन पर रुकने की हिदायत दी!  लौटते-लौटते काफी समय लग गया!  नई मूर्तियों के सेंपल देखते-देखते समय कैसा बीत गया कुछ पता ही नहीं चला!  जब भूपी घर लौटा तो आधी रात बीत चुकी थी, सारी बत्तियाँ बंद थी!  थक-हार कर सोये घर वालों को उसने जगाना उचित नहीं समझा!  भूपी चुपचाप अपने कमरे की ओर बढ़ चला!  खिड़की से आती स्ट्रीट लाइट की थोड़ी रोशनी के कारण कमरे में बहुत अंधेरा नहीं था!  सोहणी बिस्तर पर लेटी थी, उसकी आँखें बंद थीं!  भूपी कुछ देर खिड़की से उसे देखता रहा, फिर धीरे-से  बिस्तर की ओर बढ़ा!  उसका दिल जोरों से धडक रहा थाभूपी को लगा अगर सूखते हलक में फंस न गया होता तो शायद कलेजा बाहर आ गया होता!  बिस्तर के करीब पहुँच कर वह अभी झुका ही था कि एकाएक उसकी निगाह कमरे के कोने में रखी मूर्ति पर पड़ी!  उसे लगा मूर्ति के चेहरे पर व्यंग्य भरी मुस्कान थीवो खौफनाक रात उसके जेहन पर काबिज हुई और भूपी पलटा और कमरे से बाहर की ओर भागा! उस खौफनाक सूनामी की लहरों में थपेड़े खा कर आज एक बार फिर वह खाली हाथ वापस किनारे की ओर लौट आया था!  इसके बाद गली के नुक्कड़ पर अलाव के किनारे हाथ सेंकते हुये, वह बची हुई रात को तल्ख यादों की कैंची से काटते हुये अलाव में कतरे-कतरे होम करता रहा!  ये कैसी आहुति थी जिसमें उसका कल, आज और कल जल रहा हैये कैसी तपिश है जिनसे ज़िंदगी को रु-ब-रु तो खड़ा कर दिया है पर उसे उसकी जिंदगी के ही करीब नहीं आने देती थी!  फिर एक और मनहूस रात उसकी किस्मत के खाते में दर्ज हो गयी थी! वक़्त की झोली में ऐसी कई सर्द रातें भरी थीं जो एक-एक कर जादूगर के टोपी से परिंदों की मानिंद निकल कर स्याह आकाश में गुम होने लगी! 
हरिद्वार से मूर्तियों का बड़ा ऑर्डर मिला है!  लक्ष्मी बहुत खुश है आज!  इस बार कितनी ख्वाहिशें सिरे लगेगी इसका हिसाब लगाना बड़ा सुखकर है!  जल्दी ही नए ऑर्डर का काम शुरू करना है!  अब शायद कुछ हेल्पर भी रखने पड़ें!  पर भूपी इस सारे हिसाब-किताब से परे है!  उसे न खुशी से सरोकार है और न ही हिसाब-किताब की दरकार!  उसे तो बस रंगों में डूब जाना है!
जी, मैं केया, त्वानु चा दे नाल कुछ चाइदा है?”
उसने गर्दन उठाई तो एकाएक घबरा कर सर झुका लिया, सोहणी चाय के साथ नाश्ते की प्लेट थामे खड़ी थी!  उफ़्फ़, ये लंबाई कितनी खौफ़नाक शय है!!!!!!!!
पकौड़े……”
 सोहणी ने उसके पैर को धीरे से अपने पैर से दबा दिया! पैर खींचते भूपी ने संयत होते हुये चाय का कप थाम लिया!  बढ़िया, चाय अच्छी है, एक सुड़की के बाद उसका ब्रुश तेज़ी से चलने लगाभाभी की नज़र बचा कर सोहणी ने एक पकौड़ा उसके मुँह में ठूस दिया और प्लेट वहीं रख कर हँसते हुये वहाँ से चली गयी!  दूर जाती सोहणी को एकटक निहारता भूपी उसे जाते हुये देखता रहा!  फिर मुँह चलाते हुये नज़र हटा कर बिजली के तार पर बैठे पंछियों को देखने लगापंछी आज भी ऊंचाई पर बैठे चहचहा रहे थे, पर जाने क्यों आज पकौड़े का स्वाद उसे कसैला नहीं लगा! उसने एक और पकौड़ा उठा कर मुंह में डाला और ब्रश चलाने लगा!

सोहणी भाभी के पास बैठी हन्नी के साथ गिट्टे खेल रही है!  अचानक गिट्टे उछालना छोड़ कर वह भाभी से पूछती है,
भाभीए कुछ बोलते नहीं! बहुत चुप-चुप रहते हैं!  क्या हमेशा से……”
 भाभी बोलती रही और सोहणी जैसे कोई पेंसिल थामे शब्दों को मन के कैनवास पर उतारती रही!  जब वह तस्वीर मुकम्मल हुई तो सोहणी ने पाया, वह बचपन से अपने अकेलेपन से जूझते हुये उदास भूपी का रंगहीन चेहरा था, जिसमें सोहणी को जीवन और प्रेम के रंग भरने थे!   वह जान गई थी खामोशी भूपी की ढाल थी और एकांत उसका सहारा, और सोहणी ने सबसे पहले इन्ही पर निशाना साधना था!  वह उसके एकांत के व्यूह में प्रवेश द्वार ढूंढ कर  उसकी खामोशी को भंग करने का अरमान रखती थी और इसका कोई मौका छोडना उसे गवारा नहीं था!  उसने तय कर लिया था वह उसके मन पर सातों तालों को तोड़ कर भी उसके दिल में अपना आशियाँ बनाएगी!  उसके शर्मीलेपन, सादगी और उसकी मासूमियत ने सोहणी के दिल में घर बना लिया!  जिस तरह उसने सोहणी का हाथ थाम कर उसे अपनाया है, उसकी माँ के चेहरे पर संतोष और सुख के सतरंगी रंग उस चितेरे की बदौलत ही तो हैं जिसने उसे बरसों की खोयी नींद से मिला दिया! 
काके अब रोज़ रात में ऑटो चलाता है और दिन में  अपने कमरे में पड़ा ख़र्राटे भरता है!  शराब को अब छूता भी नहीं और पर बीजी ने उसके यार-दोस्तों की ऐसी क्लास ली कि वे ऐसे गायब हुये मानों गधे के सिर से सींग!  जस्सो मासी अब रसोई में नहीं सोती!  रोज बड़ी बहू और बच्चों के पास ही अपनी मँजी  लगा लेती है! सोहणी चपल, चंचल, उद्दाम वेग से बहती हुई एक अल्हड़ पहाड़ी नदी है जो  सारे बांध तोड़ कर बह निकलना चाहती है!  वहीं भूपी वह शांत और गंभीर सागर है, जिसमें समा जाने में ही नदी अपने जीवन की सार्थकता देखती है!  जिस अनदेखे, अनचाहे मीत पर जवानी की सौगात लुटा देने के सपनों ने बीसवें साल में हजारों तमन्नायेँ की थी उसका चेहरा अब धुंधला नहीं है!  सारी धुंध छंट गयी है!  अब वह जानती है उसे, पहचानती भी है, उसे लगता है जैसे वही उसका जन्मों से मीत है, जिसका साथ ही उसके लिए जन्नत है!   प्रेम जब आत्मा का स्पर्श करता है तो पुरुष अधिकार चाहता है और स्त्री प्रेम में समर्पित होना चाहती है!  सोहणी अपनी मोहब्बत के लिबास पर चाहतों के सलमे-सितारे टांकना चाहती है, आग के दरिया में डूब कर पार होना चाहती है!  अपनी मोहब्बत के साये में सुकून से ज़िंदगी बिताने का अरमान ही उसकी आरज़ू था और यही उसका ख्वाब भी बन गया था!
स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी खिड़की से कमरे के भीतर आ रही है और पूनम की वह खूबसूरत रात मानों एक दुल्हन की तरह आई हैजिसके मखमली दुशाले पर जड़े हुये अनगिनत सितारे कायनात को रोशन कर रहे हैं!  अपनी जवानी पर इठलाता चाँद उसका महबूब है, जो पल-पल उसे निहार कर खुशी से किरणों की बारिश कर रहा है! गली नंबर उस रात में भी उतनी ही रोशन और जगमग है जितनी सोहणी के मन में हिलौरे लेती कामनाएँ हैं!  सोहणी इस घर के कण-कण को अपना रही हैअपनी जड़ों से उखड़ा वह कोमल पौधा, इस अजनबी मिट्टी में अपनी जड़ें जमा रहा है!  उसे भूपी से ही नहीं उससे जुड़ी हर बात से प्यार है, वह सचमुच उसकी संगिनी बनना चाहती है!  आज उसने भी दिन भर भाभी से रंग करना सीखा है!  भूपी के ब्रश को हाथ में लेते हुये जिस सिहरन को उसने तन-बदन में महसूस किया, वह उस सिहरन की ही सहेली मालूम हुई थी जो सोहणी ने  उसे पहली बार छू कर महसूस की थी!  भूपी आज दिन भर उसके करीब था, उन्होने साथ खाना खाया और आज उसने पहली बार भूपी की आँखों में प्यार का वह उमड़ता सागर देखा जिसकी एक झलक देखने की आस उसे बेचैन किए हुये थी!  उसके स्पर्श को याद कर अपने सुख में मग्न सोहणी कहाँ जानती थीये सिहरन जैसे उसकी तन की नहीं मन की भी सिहरन थी, जिसने अवसाद की सौ परतों के नीचे दफ्न उस सुसुप्त आत्मा को भी सहला दिया था जो जाने कब से पत्थर की मूर्तियों के बीच रहते-रहते रफ्ता-रफ्ता एक बेजान मूर्ति में बदल रही थी!  यह बरसों से बंद पड़े आशाओं के उस द्वार पर हुई एक बहुप्रतीक्षित किन्तु अप्रत्याशित आहट थी जिस पर जाने कब से निराशा का जंग खाया ताला झूल रहा था!  उस द्वार की चरमराहट से भूपी कब तक अंजान बना रहेगा, ये रात की भी चिंता का विषय था और गली नंबर 2 की भी!
भूपी दीवार से सर टिकाये हुये चाँद को देख रहा है, तभी नीचे के कमरे की खिड़की से दीवार पर पड़ रही रोशनी में दो साये एकाकार होते दिख रहे हैं!  भूपी को अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही है!  उसने नज़रें वहाँ से हटा लीं!  शायद आज काके देर से काम पर निकलेगा!  भूपी चुपचाप कमरे में आ कर लेट गया है!  उसका चित्त शांत नहीं है और नींद आँखों से दूर, बहुत दूर सैर पर निकली है!  ये चाँद और आँखें, दोनों की साजिश खूब रंग ला रही थी!
चिट्टा कुकड़ बनेरे ते, काशनी दुपट्टे वालिये, मुंडा सदके तेरे ते……”
अपने काशनी (बैंगनी) दुपट्टे को लहराती, गुनगुनाती  उस चंचल, चपल हिरनी ने जब कमरे में प्रवेश किया!
वह नहीं जानती कि भूपी सो रहा है या जाग रहा है!   हाँ, पर वह जाग रही है, चाँद जाग रहा है, रोशनी में नहाई गली जाग रही है और जाग रही हैं उसकी तमाम उद्दात कामनाएँ!  नदी का सागर के प्रति समर्पण उसका स्वभाव है और उस भाव की सुखद परिणिती उसका ध्येय!  इसके लिए रास्ते में आने वाली हर बाधा, बांध को तोड़ कर भी वह बढ़ती जाती हैनिरंतर, गतिशील!  तो पूरे चाँद की उस एक रात में सब अपने लक्ष्य की बढ़ रहे थे आहिस्ता-आहिस्ता!  नदी बेखौफ़ बढ़ रही थी कि उसे सागर से मिलना था, वहीं सागर चाँद के आकर्षण में समस्त गुरुत्वाकर्षण को समेटे हर पल उस आसेब से लड़ रहा था जो लगातार उसे अपने और खींच रहा था!  सोहणी ने उसके करीब जाकर धीरे से उसे छुआ!  अब वो भूपी के बेहद करीब थीउन दोनों के बीच पसरी वह सर्द, अनजान रात धीमे-धीमे एक सुंदर सवेरे की तलाश में अपने मुसलसल सफर पर थी!  धीरे-धीरे रात पिघलने लगी थीजिस्म की गर्मी की तपन के आगे धधकते शोले भी शीतल झोंके मालूम होते हैं!  इसके बाद उनके बीच उस रात के लिए भी कोई जगह नहीं रही, पिघलती रात उनके जिस्म में समा गयी थी और वे दोनों एक दूसरे में! सोहणी के प्यार और समर्पण की कशिश ने सम्मोहन के टूटने का कोई भी मौका पास नहीं आने दिया और आखिरकार वही हुआ जिसके होने के विषय में लगाए जा रहे गली नंबर 2 के सारे अनुमान अपने शिखर पर थेजिसका होना कल तक सुगबुगाहटों में बुना जाता था, जाने कब से नियति की तारीखों में दर्ज किया जा चुका था!  इससे पहले कि रात उस चमकदार, धवल सवेरे की गोद में बेसुध होती, चंचल नदी का पानी सारे बांध तोड़ कर सागर की ओर बह निकला, वहीं सागर ने भी स्वयं को ज्वार के हाथों सौंप दिया! समर्पण के रंग ने उस रुपहली रात को एक नए रंग में रंग दिया यकीनन यह पहले प्यार का रंग था जो इस दुनिया में मौजूद हर रंग से कहीं ज्यादा दिलकश और पुरअसर था!
भूपी ने आँखें खोल कर सोहणी के चेहरे की ओर देखा, वह अब भी उसकी बाहों में थी, जीती-जागती, मुस्कुराती, लजाती और अपने सुख को महसूसती सोहणी!  एक पल को उसे लगा मानो चाँद में सीढ़ियाँ लग गयी और खिड़की से दूधिया चाँदनी उसकी बाहों में उतर आई है!  पर ये क्या, ठीक उसी पल उसने घबरा कर कमरे में मौजूद मूर्ति की और देखा, कमरे के भीतर पसरी दूधिया सफेदी में  मूर्ति हमेशा की अब भी उसी कोने में रखी थी और छत भी वहीं मौजूद थी जहां उसे होना चाहिए था!  कहीं कुछ न बदला था, सब वैसे ही था जैसे पहले कभी न हुआ था, जैसा होना चाहिए था!  सोहणी ने उसके सीने पर आहिस्ता से अपना सिर टिका दिया और ठीक उसी क्षण भूपी के मन में तना बरसों पुराना वह ठूंठ जैसे लरज़ गया था, दरक गया था, चटक गयाऔर ये क्या, आज उसकी ऊँचाई इतनी अधिक नहीं कि भूपी भय से उसके कदमों में अपना सर झुका दे!  जिंदगी में पहली बार आज भूपी को ठूंठ से कोई डर नहीं लगा!  फिर नींद ने उसे अपने आगोश में यूं ले लिया था जैसे माँ थपक कर किसी बच्चे को सुला देती है!
सुबह हो चुकी है!  रात अकेली नहीं गयीअपने साथ जाने कितने बरसों के दुख, अवसाद, अकेलेपन और अंधेरे को समेटे विदा हुई है!  सूरज की आहट से अभी-अभी जागी गली नंबर 2 ने अंगड़ाई लेकर अपनी आँखें खोल दी हैं!  आज का दिन सबके लिए कुछ खास है और ये सवेरा सबके लिए कोई न कोई सौगात लेकर आया है!  परिवार का जल्द ही मूर्तियों की फ़ैक्टरी शुरू करने का विचार है, जस्सो मासी आज से अपनी फ़ैक्टरी जाना छोड़ रही है, आखिर उसके कमाऊ पूत अब अपनी अपनी गृहस्थी संभालने लायक हो गए हैं और वह अब चैन से धूप में मँजी डाल कर मासड़ (अपने पति) से बतियाते हुये, अलसाते हुये अमरूद और मूँगफलियाँ खाते हुये, उनके बच्चे खिलाना चाहती है!  क्या कहने!!!!!  इस सुख पर तो सात स्वर्ग भी सदके!  काके की लोन की अर्ज़ी मंजूर हो गई है! आज घर में अपना ऑटो आएगा, मुस्कुराहटें बिखेरती लक्ष्मी पूजा की थाली सजा रही है! खिड़की के बाहर सोहणी तुलसी को पानी दे रही है, हर बूंद के साथ रिस रहा है भूपी के मन का डर, तिरोहित होती जा रही हैं वे तमाम काली भयानक रातें जो सालों से उसे कैद किए हुये थीं!  एकाएक उसे महसूस हुआ कि रफ्ता-रफ्ता अपनी ऊंचाई खो चुका वह ठूंठ पिघल रहा है!  ऐसा सवेरा उसके जीवन में पहले कभी नहीं आया था और उस सुबह उगते सूरज ने उदास चाँद से जुड़े उसके सभी मनहूस रिश्तों की कालिख को अपनी सुनहरी किरणों के रंग से धो दिया था!  भूपी ने आँखें बंद की तो पाया ठूंठ नहीं उसकी जगह लहराता हुआ एक हरा पौधा है, जिसमें नन्ही-नन्ही कई कौंपले उग आई हैं!  नन्ही-नन्ही कौपलें, हरी-हरी कौपलेंउसके और सोहणी के अरमानों से सजी कौपलें!  सचमुचउन सबके जीवन में सुबह हो चुकी है!
सम्पर्क-
41-A,
आनंद नगर,
इंद्रलोक मेट्रो स्टेशन के सामने
दिल्ली 110035

फोन : 09873893119

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं)

अंजू शर्मा

शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी,  आलोचना त्रैमासिकी, परिकथा, देशज समकालीन, कृत्या, जनसंदेश टाइम्स (लखनऊ), डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट (लखनऊ), नयी दुनिया (जबलपुर), नेशनल दुनिया, शोधदिशा, ऋचा साहित्यिक पत्रिका (डालमिया ग्रुप), शब्दशिल्पी (सतना), सरिता (दिल्ली प्रेस),  द फैक्ट ऑफ़ टुडे आदि पत्र-पत्रिकाओं में कवितायेँ, लेख नियमित प्रकाशित!  

                                     

नयी-पुरानी हलचल, युगज़माना, हस्तक्षेप डाट कॉम, खरीन्यूज़ डाट कॉम, अपनी माटी डाट कॉम आदि इ-पत्रिकाओं पर कविताओं, लेखों एवं रिपोर्ट का प्रकाशन।

                                    

‘जानकीपुल’, ‘समालोचन’, ‘पहली बार’, ‘उदाहरण’, ‘वाटिका’, ‘सृजिता’ जैसे अग्रणी एवं प्रतिष्ठित ब्लोग्स पर कविताओं और लेखों का प्रकाशन।

‘कविता कोष’ में परिचय एवं कवितायेँ।
 
बोधि प्रकाशन से प्रकाशित “स्त्री होकर सवाल करती है” (काव्य संकलन) में कवितायेँ सम्मिलित।


बोधि प्रकाशन से प्रकाशित संकलन “लिखनी ही होगी एक कविता” में कवितायेँ सम्मिलित।  एकल काव्य संकलन प्रकाशाधीन।

कविता पाठ से जुड़े विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों से सक्रिय जुड़ाव!

2012 – काव्य लेखन के लिए इला त्रिवेणी सम्मान 2012 से सम्मानित 
2013 – लेखन के लिए राजीव गांधी एक्सलेन्स अवार्ड 2013 से सम्मानित 

संप्रति : स्वतंत्र लेखन 

जिंदगी की कठिन लिपि को आसानी से पढ़ना हो तो कविता पढी जानी चाहिए। जिन्दगी जिसमें होते हैं हमारे संघर्ष, हमारे दुःख, हमारे पराजय और इन सबके साथ थोड़े सुख, आनन्द और जीत के पल। लेकिन कैसा रहे यदि दुःख से ही दोस्ती कर ली जाय। दुःख निवारण का यह उपाय कोई कवि ही कल्पित कर सकता है। अंजू शर्मा हमारे समय की ऐसी कवियित्री हैं जिन्होंने अब अपनी एक ठोस पहचान बना ली हैं। पहली बार पर आप पहले भी इनकी कवितायें पढ़ चुके हैं। आईये एक बार फिर पढ़ते हैं अंजू शर्मा की नयी कवितायें।    

जीवन में चिंताएँ

जीवन  स्वतः पलटे जाते पृष्ठों वाली
एक किताब न बन जाए,
बोरियत हर अध्याय के अंत पर चस्पा न हो
इसके लिए जरूरी है कुछ सरस बुकटैग्स,
जरूरी है बने रहना, थोड़ा सा नीमपागल
थोड़ा सी गंभीरता
थोड़ा सा बचपना
थोड़ा सी चिंताएँ
और थोड़ा सा सयानापन,
होना ही चाहिए सब कुछ ज़िदगी में पर थोड़ा थोड़ा,

यूं देखा जाए तो जिंदगी वह फिल्म है जिसे समझ आने तक 
आप पाते हैं खुद को मध्यांतर में,
ज़िंदगी का अर्थ क्या है और यह सम्मिश्रण है किन पदार्थों का
जूझते हुये लगातार इन सवालों से,
सावधानियों के रैपर में लिपटी जिंदगी पर चिपके
‘फ्रेगाईल, केयरफुल’ के स्टिकर को ताकते रहने में
आप खो देते हैं जीते रहने का परम सुख

अलगनी पर टांग ही दीजिये खाल बनी जिम्मेदारियाँ,
एक दिन कान से पकड़ कर
बंद कर दीजिये कुछ समय के लिए
चिंताओं को अंधेरी काल कोठरी में,
छत की कड़ियाँ गिनते हुये थामती रहे उंगली,
उकसाती रहे, तारे गिनने को खिलंदड़ अनिद्रा,
तब भी जब बगलगीर हो थोड़ा सा उनींदापन,

खुद से खुद का ही ले लेना चाहिए एक त्वरित अपोइण्टमेंट,
चिंताओं के घने अरण्य में खोने से पहले 
किसी प्रिय की तलाश में निकले
एक आवारा सरफिरे बादल का हाथ थामते हुये
ठंडी हवा के अलमस्त झोंको
और बारिश की नन्ही-नन्ही बूंदों के बीच
खो देना चाहिए कभी कभी छाता
तकरीबन भूलते हुये कि वह टंगा है वहीं
स्टोर रूम के ठीक सामने वाली दीवार पर

धीमे से बुला लेना चाहिए इशारे से,
घड़ी की चौबीस-घंटा टिक टिक
और मोबाइल की घण्टियों के बीच
बदहवास पेंडुलम बनी जिंदगी को,
मन के सीलन भरे कोने में रोप देने चाहिए
धूप से खिले, प्रथम चुंबन से ताज़ा, कई खुशनुमा किस्से,
कि मन बदल ही जाए ऐसे कुतुबनुमा में
जिसे लुभा पाएँ खुशियों के कई एक यादगार छोटे छोटे पल,

इससे पहले कि जीवन बदल जाए
कब्र पर खुदी जन्म और मृत्यु की तारीखों के
ठीक बीच में लगे एक हाइफन में
सचमुच जी ही लो बिताई गयी लंबी जिंदगी  के कुछ पुरसुकून  पल,
जानते हुये भी कि चिंताएँ ही सुखद भविष्य का रिमोट कंट्रोल हैं,
मान ही लीजिये चाहे कुछ पलों के लिए ही सही,
चिंताएँ कल्पना का सबसे बड़ा दुरुपयोग भी तो हैं……..


 
दुख – पाँच कवितायें

दुख – एक 
 
दबे पाँव रेंगता आता है
दुख जीवन में,
स्थायी बने रहने के लिए
लड़ता है सुख से
एक अंतहीन लड़ाई,

दुख को रोक पाने
जब नाकामयाबी मिले
तो कर लेनी चाहिए
एक दुख से दोस्ती
एक छोटा सा दुख
रो लेता है साथ
कभी भी,
कहीं भी

दुख – दो 

सुख की क्षणिक लहरों में
डूबते उतरते
एक दुख थामे रहता है
जमीन पर जिंदगी का सिरा,
वह होले से बुहार देता है
तुम्हारे घर और जीवन से
अनचाहे भुलावे,
पकड़ लो कस कर
दुख की उंगली
ताकि पहचान सको
दुख के पीछे की छिपी हंसी,
क्रोध के पीछे छिपा प्यार
और खामोशी के पीछे छिपे गहन अर्थ,
दुख समय के सुनार के हथोड़े की
वो चोटे  हैं जो बदल देती हैं
ज़िंदगी को खरे स्वर्णाभूषण में

  

 दुख – तीन 
 

खलील जिब्रान दुख के कंधे
पर रखते हैं अपना सिर,
सहलाते हैं उसकी पीठ
फिर धीमे से बुदबुदाते हैं
कि दुख धीमे धीमे कचोटता है,
कुरेदता है तुम्हारा अन्तर्मन
और बना लेता है बहुत से सुखों के लिए
एक सुरक्षित कोना,
यह वह पात्र नहीं है
जो थामता है तुम्हारी शराब
वह पात्र तो कुम्हार के आवें में
कब का जल चुका,

सुख की मधुर लहरियां पाने को
गुजरना ही होता है बांस को
चाकुओं की पुरखतर नोकों से,
सुख वह मुसाफिर है जिसे एक दिन
खुशी के रास्ते गुज़र जाना है,
इसका स्थायी पता कुछ भी नहीं,
दुख जीवन के समुद्र की रेत पर
लिखा वह नाम है
जिसे हम आंसुओं के ज्वार में
आसानी से बह जाने देते हैं


दुख – चार

दुख ईसा की सलीब पर पैबस्त
दर्द का नाम है,
वहीं सुकरात के जहर भरे प्याले से उठी
तूफान के आमद की आहट भी है दुख,
दुख के पाँव बोझिल हैं बेड़ियों से
और उसके हाथ थाम लेते हैं
कलाई किसी पुराने मित्र की तरह,
सुख के पाँव अक्सर बदल जाते हैं
सुदूर उड़ान भरने को आतुर परों में,
उसकी तोताचश्म बिनाई सदा
ताकती है खुला द्वार
सँजोती है तुम्हें नींद में छोड कर
दूर चले जाने का स्वप्न हौले-हौले

दुख – पाँच 

सुख जहां मोनालिसा की
मुस्कुराहट सा छद्म भुलावा है,
दुख के आईने में साफ साफ नज़र आती
हैं अपने और परायों की असली सूरते,
खुद पर मँडराते उदासी के पक्षी को
रोकना मुश्किल हो सकता है
तो भी रोक तो
उसे अपने बालों में
स्थायी घोंसला बनाने से 
दुख के उद्गम से ही निकलता है
सुख का एक ठंडा सोता,
एक दुख ही जनक है सुख की सपनीली
उड़ानों का
बना लीजिये दुख को अपना मीत क्योंकि 
दुख की कोख से ही जन्मती है
अक्सर एक नन्हें से
सुख की स्वप्निल अभिलाषा…………..

  

हम निकल पड़े हैं 
हमने मांगी जिंदगी
तो थोपे गए तयशुदा फलसफे,
चाहीं किताबें
तो हर बार थमा दिए गए अड़ियल शब्दकोष,
हमारे चलने, बोलने और हंसने के लिए
तय की गयीं
एकतरफा आचार-संहिताएँ,
हर मुस्कराहट की एवज में
चुकाते रहे हम कतरा-कतरा सुकून
  
हम इतिहास की नींव का पत्थर हैं
किन्तु हमारे हर बढ़ते कदम के नीचे से 
खींचे गए बिछे हुए कालीन
और हर ऊँचाई की कतर-ब्योत को
 

जन्मना हक समझा गया,  
हमसे छीने गए पहचान, नाम और गोत्र तक,
झोली में भरते हुए लाचारगी,
चेहरों पर चिपकाई गयीं कृत्रिम मुस्काने,
सजे धजे हम बदलते रहे दुकानो  के बाहर खड़े
36-24-36 के कामुक मेनेक़ुइन्स में,

हद तो तब हुई ज़नाब,
जब हमसे हमारे ही होने के मांगे गए सुबूत,
आंसुओं को गुज़रना पड़ा लिटमस टेस्ट से,
और आहों के किये गए मनचाहे नामकरण,
गढ़ी गयी नयी नयी कसौटियां और
आँचल में बांध दिए गए
कितने ही सूत्र, समीकरण, नियम, सिद्धांत
और सन्दर्भ,
तन तो पहले ही पराये थे
हमारे मनों पर भी कसी गयीं नकेलें
तयशुदा टाइम-टेबल पर बारहोमास यंत्रवत चलते हम
भूलने लगे   न्यूटन का गति का तीसरा नियम,
याद दिलाया तो केवल यही
कि  जीवन में सापेक्षता के सिद्धांत में
केवल डूबना ही मायने रखता है,
कि हमें बदल जाना है हर जल में घुलनशील एक पदार्थ में,
और हमारी लोच पर लगायी गयी तमाम शर्तें, 
हम मानने ही लगे कि इंसान और मशीन के बीच
धड़कते दिल का फर्क बेमानी है, 
और हायबरनेशन पर गए हमारे दिल का काम था
सिर्फ और सिर्फ खून साफ़ करना,

हमने सीखा एक औरत का तापमान
अप्रभावित रहता है सभी कारकों से,
हमें बताया गया समकोण त्रिभुज की
दोनों भुजाओं के वर्ग का योग
बराबर होता है तीसरी भुजा के वर्ग के,
और हम सुनिश्चित करते रहे कोण समकोण ही रहे,
तब भी जब बढती रही दोनों भुजाएं विपरीत दिशाओं में
और बदलता रहा हर मोड़ पर तीसरी भुजा का माप,

हमने पढ़ा मांग और पूर्ति के समस्त नियम तय करते हैं
कीमत को,
पर देखिये तो हमारी कीमतें तो बेअसर ही रहीं
ऐसे सभी नियमों से,

हमारे लिए रची गयी “चरित्रहीन” की “सुरबाला” और
हमें बदल जाना था वक़्त आने पर “मर्चेंट ऑफ़ वेनिस” की
“पोर्शिया” में,
हमारी हर उठी आवाज के लिए नजीर थे
अनारकली और लक्ष्मीबाई के दुखद अंत, 
चाँद बीबी और रज़िया सुल्तान की कोशिशें
तो भेंट चढ़ा दी गयी साजिशन बलि,

हम तब भी बढ़ते रहे
बार बार काटी गयी, फिर भी उगती, अनचाही खरपतवार से,
हवा, धूप और पानी के बगैर भी
जीने के लिए अनुकूलित हुए हम निर्लज्ज,
बनाते रहे दुनिया के हर कोने में जगह
जैसे कुर्सियों से भरे  सभागार में अड़े खड़े हो अनामंत्रित अतिथि
जैसे विपरीत दिशा में बढ़ने को आतुर हो कोई जिद्दी घोडा,
जैसे बारह बरस के जतन के बाद भी मुंह चिढाती हो कुत्ते की टेढ़ी पूंछ,
जैसे डी डी टी से प्रभाव से बेअसर हो बढ़ते ही जाएँ निर्दयी हठीले मच्छर,
जैसे लोककथाओं में बार बार मरने पर भी
अभिशप्त हो लेने के लिए सात जन्म कोई बिल्ली,
जैसे सूखी जमीन पर फलता फूलता जाये बिना पानी यूकेलिप्टस,

हम जानते हैं घोडा, कुत्ते, मच्छर और बिल्ली से इंसान बनने की प्रक्रिया
चूसती ही रहेगी पल पल हमारा पनियल लो-हीमोग्लोबिन वाला खून
तो भी हम जाग उठे हैं सदियों की नींद से,
हम सीख चुके हैं हुनर कमजोरियों को अस्त्र-शस्त्र में बदलने का,
और अपनी नाकामियों को नहीं बनायेगे हम अपनी ढाल
इस बार खून की कमी भी हमें नहीं सुला पायेगी
नकारते हुए संस्कारों की चिरपरिचित अफीम, 
हम निकल पड़े हैं अपने स्वाभिमान के लिए विजययात्रा पर…………  

सम्पर्क
ई-मेल: anjuvsharma2011@gmail.com

 


अंजू शर्मा

मैनेजमेंट के क्षेत्र में नौकरी को छोड़ कर परिवार और लेखन को वक़्त देने वाली अंजू कविताएँ और लेख लिखना पसंद करती हैं. इनकी रचनाएँ जनसंदेश टाईम्स, नयी दुनिया, यकीन, सरिता जैसी पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं. अंजू विभिन्न ई-पत्रिकाओं से भी जुडी हुई हैं. kharinews.com, नयी पुरानी हलचल, सृजनगाथा, नव्या आदि में कवितायें और लेख प्रकाशित हुए हैं. अभी हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर द्वारा प्रकाशित स्त्री विषयक काव्य संग्रह औरत हो कर भी सवाल करती है में भी इनकी कवितायें शामिल हैं. वर्तमान में अकादमी आफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर के कार्यक्रम डायलोग और लिखावट के आयोजन कैम्पस और कविता और कविता पाठ से बतौर कवि और रिपोर्टर रूप में भी जुडी हुई हैं.          
यह सुखद है कि आज कविता का जो वितान बन रहा है उसमें स्त्रियों का महत्वपूर्ण स्थान है. इन कवियित्रियों ने यह पहचान अपने दम पर बनायी है. अंजू शर्मा एक ऐसा ही नाम है जिन्होंने अपनी कविताओं में स्त्री अस्तित्व के प्रश्न को तलाशने की कोशिश की हैं. चूकि वे इस जीवन से खुद रू-ब-रू हैं अतः यह तलाश उनकी कविताओं में स्वाभाविक रूप से आया है. अंजू को यह भलीभांति मालूम है कि एक स्त्री आज जाग गयी है अब उसे रोक पाना संभव नहीं है. अब वह उन मिथकों की कैद से भी मुक्त हो जाना चाहती है जिसके नाम पर शताब्दियों से ले कर अब तक उसका शोषण किया जाता रहा है. अब वह अपनी पहचान की गाथा खुद अपने नए बिम्बों के साथ लिख रही है. ऐसे बिम्ब जो टटके तो हैं हीं, उनका धरातल भी पुख्ता है.     

तीलियाँ

रहना ही होता है हमें
अनचाहे भी कुछ लोगों के साथ,
जैसे माचिस की डिबिया में रहती हैं
तीलियाँ सटी हुई एक दूसरे के साथ,


प्रत्यक्षतः शांत
और गंभीर
एक दूसरे से चुराते नज़रें पर
देखते हुए हजारो-हज़ार आँखों से,
तलाश में बस एक रगड़ की
और बदल जाने को आतुर एक दावानल में,


भूल जाते हैं कि
तीलियों का धर्म होता है सुलगाना,
चूल्हा या किसी का घर,
खुद कहाँ जानती हैं तीलियाँ,
होती हैं स्वयं में एक सुसुप्त ज्वालामुखी
हरेक तीली,


कब मिलता है अधिकार उन्हें
चुनने का अपना भविष्य
कभी कोई तीली बदलती है पवित्र अग्नि में तो
कोई बदल जाती है लेडी मेकबेथ में………….

एक स्त्री आज जाग गयी है….

(१)


रात की कालिमा कुछ अधिक गहरी थी,
डूबी थी सारी दिशाएं आर्तनाद में,
चक्कर लगा रही थी सब उलटबांसियां,
चिंता में होने लगी थी
तानाशाहों की बैठकें,
बढ़ने लगा था व्यवस्था का रक्तचाप,
घोषित कर दिया जाना था कर्फ्यू,
एक स्त्री आज जाग गयी है………….


(२)


कोने में सर जोड़े खड़े थे
साम-दाम-दंड-भेद,
ऊँची उठने को आतुर थी हर दीवार
ज़र्द होते सूखे पत्तों सी कांपने लगी रूढ़ियाँ,
सुगबुगाहटें बदलने लगीं साजिशों में
क्योंकि वह सहेजना चाहती है थोडा सा प्रेम
खुद के लिए,
सीख रही है आटे में नमक जितनी खुदगर्जी,
कितना अनुचित है ना,
एक स्त्री आज जाग गयी है……




(३)


घूंघट से कलम तक के सफ़र पर निकली
चरित्र के सर्टिफिकेट को नकारती
पाप और पुण्य की
नयी परिभाषा की तलाश में
घूम आती है उस बंजारन की तरह
जिसे हर कबीला पराया लगता है,
तथाकथित अतिक्रमणों की भाषा सीखती वह
आजमा लेना चाहती है
सारे पराक्रम
एक स्त्री आज जाग गयी है………….




(४)


आंचल से लिपटे शिशु से लेकर
लैपटॉप तक को साधती औरत के संग,
जी उठती है कायनात
अपनी समस्त संभावनाओं के साथ,
बेड़ियों का आकर्षण,
बन्धनों का प्रलोभन
बदलते हुए मान्यताओं के घर्षण में
बहा ले जाता है अपनी धार में न जाने
कितनी ही शताब्दियाँ,
तब उभर आते हैं कितने ही नए मानचित्र
संसार के पटल पर,
एक स्त्री आज जाग गयी है………….




(५)


खुली आँखों से देखते हुए अतीत को
मुक्त कर देना चाहती है मिथकों की कैद से
सभी दिव्य व्यक्तित्वों को,
जो जबरन ही कैद कर लिए गए
सौपते हुए जाने कितनी ही अनामंत्रित
अग्निपरीक्षाएं,
हल्का हो जाना चाहती हैं छिटककर
वे सभी पाश
जो सदियों से लपेट कर रखे गए थे
उसके इर्द-गिर्द
अलंकरणों के मानिंद
एक स्त्री आज जाग गयी है………..

औरत और देवी

औरत….
ईश्वर की अनुपम कृति,
जन्मदात्री, सहोदरी, भार्या, पुत्री,
सुशोभित करती रहीं देवी का पद
जिन्हें सौप दिए गए
तमाम शक्तिशाली मंत्रालय,
और वे कुशलता से संभालती रही,
धन, शक्ति, विद्या, अन्न और सृजन,


मंदिरों में सुशोभित हैं वृहद् प्रस्तर प्रतिमाएं,
लदी हुई मालाओं और अलंकृत स्वर्णाभूषणों से,
जिनके पैरों में गिरे जाते हैं ज़माने के खुदा,
वही जिन्होंने घोषित किये नित नए कानून
और बनायीं रोज़ नयी आचार-सहितायें,


शिवालयों की सीढ़ी उतरते ही
घोषित कर दी जाती है
पापिनी नरक का द्वार,
हर पुरुष के पीछे खड़ी छाया
बन जाया करती है हर फसाद की जड़,


धारण करती है अनचाहे गर्भ की तरह
बोझ तमाम कुत्सित लालसाओं
और महत्वकांक्षाओं का,
बन जाती है स्वर्ग-दात्री गंगा,
सोख लिया करती हैं सारे पाप
स्याहीचूस की तरह


या ऐसी दीवार जिस पर लिख दिए जाते हैं
सारे कन्फेशन,
और हो जाते हैं स्वतंत्र
नैतिकता के मठाधीश
करने के लिए नए नए क्रियाकलाप,


या वह टिशु पेपर जिससे पौंछ कर अपनी
गंदगी स्वच्छ और पवित्र हो जाते हैं
समाज और दुनियादारी के ठेकेदार,


और यदि रास्ते की धूल चुभ जाती है
कंकड़ बन के आँखों में,
तो पाट दिए जाते हैं राजमार्ग,
नए नए कानून, आयोग और जांचें भी
खोजती रहती हैं उनके नामालूम नामोनिशान,
जानते हुए भी कि
पत्थर और प्रतिमा के बीच का
अंतर उतना ही है,
जितनी अलग है औरत एक देवी से……